सावन

बारिशों के दिन हैं, बारिश चाहे कमज़ोर ही सही।

गर्मियों की झुलस के बाद जो पहली बूँद गिरती है, यूँ लगता है जैसे दम घुटने से साँस भर पहले ज़िन्दगी फिर से बहने लगी हो। सूखी, प्यासी-सी धरती और प्यासे-से अरमानों को एक राह मिलती है। जो कहीं रुकने लगी थीं, थमने लगी थीं, वो दुआएँ पेड़ों की टहनियों पर पत्ते बन खिलती दिखती हैं। हाँ, सिर्फ भला होता है ऐसा भी नहीं है। हमारे शहरों की जर्जर व्यवस्थाओं को बारिशों में डूबते देखते हैं, सड़कों पे बनती नदियों में गलते कागज़ों के कारवां हर साल न जाने कौन सा समंदर तलाशते हैं।

जीवन की बाकी तस्वीरों की तरह, सावन के भी दो चेहरे हैं: यह सृजन भी है, यह विनाश भी है। आगे लफ़्ज़ों में लेकिन कुछ एक ही सूरत दिखेगी – आशा की – और इसकी वजह भी है। आस-पास की गर्त, की दुर्व्यवस्था न गिनने से कम होगी न व्याख्या करने से। हाँ, शायद खूबसूरती और प्रयास को सोचकर हम मन के अनगिनत तनावों को भुला सकेंगे, आने वाले सवालों को टटोलने की थोड़ी ज़्यादा हिम्मत जुड़ा सकेंगे।

कई कविताएं लिखी हैं पर काफ़ी वक्त से इतना वक्त किसी ने नहीं लिया। पढ़ के बताइयेगा ज़रूर कैसी लगी…

सावन

फिर उठी है खुश्बू, फिर से हवा चली है,

राहत से भीगी आज घर की गली है,

 

बहुत देर हुई सावन बरसा है आख़िर,

अरसे की प्यास थोड़ी सम्भली है…

 

दुआओं के झुरमुट बादल बन सजे हैं,

उम्मीद का हरा पहन धरा फली है,

 

वो आस्मां बूँद बन बरसा है मुझ पर,

मन में मची खलबली है,

 

साँसें फिर ज़िन्दगी का नशा चढ़ा रही हैं,

हवाओं में इक तमन्ना मनचली है,

 

छोड़ने लगी हैं कई कश्तियां साहिल को,

ख्वाबों की नहर कुछ ऐसी चली है,

 

कहीं बचपन के कदम कुछ जवां से हुए हैं,

मोड़ के बंग्ले में जो खिली इक कली है,

 

शर्माजी दोबारा घर जल्दी आने लगे हैं,

बीस बरस पकोड़ों पर मोहब्बत तली है,

 

और तुम नहीं हो फिर भी तुम से भीगा हूँ,

उन आँखों में ज़िन्दगी कुछ ऐसी फिसली है,

 

इस सावन की बौछार से कौन बचा है आखिर,

कहीं प्यास बुझी है, कहीं आग जली है…

 


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