चलो कहीं डेरा डाल लेते हैं

This year has begun with great promise: one made by me, some made by life. After all the running around and hassles of the years gone by, there looks to be signs of peace.

There is hope that we can settle down (in more ways than one), let go of the trifles of everyday living, and rest.

 

चलो कहीं डेरा डाल लेते हैं…

बैठे-बैठे भी थक गए हैं,

बहुत हुआ यह सफ़र सखी,

चलो कहीं डेरा डाल लेते हैं…

 

इन्हीं गलियों में कहीं,

किसी बरगद के नीचे आओ,

कुछ क़िस्से मेरे सुनो,

कुछ बातें तुम सुनाओ,

बातों-बातों में ज़रा,

इक जीवन निकाल लेते हैं…

 

वैसे भी इतने शहर देखे हैं,

कहो तो ज़रा क्या पाया है?

नींदें गिर्वी रख सुबह के पास,

हीरा नहीं पत्थर कमाया है,

बाँटकर भेड़ों में यह कंकर सारे,

वक़्त की दौलत संभाल लेते हैं…

 

मैंने दुनिया में क़ीमत लगानी सीखी है,

पर तुम्हारे मन का मोल नहीं है,

थके क़दमों के लिए, अनकहे सदमों के लिए,

आँसू हैं, कोई बोल नहीं है,

इन आँसुओं से धो कर दामन,

फिर दिल में मशाल लेते हैं…

 

चलो अब आओ भी सखी,

पैर पसार ज़रा लेटें धरा पर,

साँसे लें हवाओं से जिन्होंने चाँद को छुआ है,

बैठ जाएँ यह जहाँ भुलाकर,

वैसे भी बहुत साधारण है रस्म-रिवाज़ इसके,

चुन के सपने तो बेमिसाल लेते हैं…

 


कुछ औरों के किस्से हैं, कुछ मेरी कल्पना है – सब अपने ही तजुर्बे हैं। कविता कैसी लगी, कमेंट्स में लिखकर बताइएगा…

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