जाने कैसी मुलाक़ात होगी

Marriage is the final triumph of societal life. All actions in public life stem from it, reach for it, and once the task is done, are set in motion again for the next generation. Nature has, of course, wired every species to seek survival. Man, thankfully, is the only one that makes such a show of it.

But since the show is there, it gives rise to many stories and many rituals. Cultures change them with great frequency, art celebrates it in all. In India, we have the arranged marriage – where parents get a couple together, having previously satisfied themselves of the financial, societal, and emotional state of the other family. The young (would be) couple meets in a public place with a great delegation of their relatives, and is usually given a little amount of time to talk to each other and get to know the person. At least a couple such meetings happen, usually more.

It is a process subject to great ridicule but has also considerable success. Anyone reading this in the West will probably be shocked by this way of going about the business of marriage, but they will of course appreciate that things change in other parts of the world.

But even when some things change, some remain the same.


जाने कैसी मुलाक़ात होगी

क्या कहेंगे उनसे,

जाने क्या बात होगी,

नए सफ़र को देखते दो दिल,

जाने कैसी मुलाक़ात होगी,

 

क्या बचपन के क़िस्से याद करेंगे,

और शैतानियों से दिल बहलायेंगे,

माँ के आँचल में छुपने की नौबत,

पापा के थप्पड़ दोहराएँगे,

 

या जवाँ होने की फुसफुसाहट होगी,

और बतलाएँगे कब और कैसे दिल को जाना था,

कब आवाज़ों में साज़ों की धुन सुनी थी,

कब गुलों की ख़ुशबुओं को पहचाना था,

 

बातें शायद किताबों काग़ज़ों की भी होंगी,

क्या पता शायद डिग्री के भाव तोले जाएँ,

या कहीं यह यक़ीं दिला सकें कि हम नहीं,

लफ़्ज़ जो सूखे इम्तिहानों में बोले जाएँ,

 

ना जाने कैसे यह क़िस्से बयाँ होंगे,

वक़्त भी और बोल भी ज़रा पाबंद रहेंगे,

पहली बार रू-ब-रू, पहली बार तनहा,

एक लम्हे के बाद न जाने कितने पसंद रहेंगे,

 

अतीत की ही नहीं, बातें आते कल की भी हैं,

अपनी ख़्वाहिशों की फ़ेहरिस्त है, उनकी जाननी है,

समझना है क्या सोच रखा है ज़िंदगी के लिए,

कितनी सम्भालनी है, कितनी सँवारनी है,

 

अरमान हर दिल में होते हैं, सपनों की उम्र होती नहीं,

जैसे अपने हैं वैसे उन नैनों ने भी देखे होंगे,

तमाम ज़िंदगी गर एक चूल्हा जलाना है,

उम्मीद के दो कौर तो उन्होंने भी सेके होंगे,

 

दो अलग राहों पे अब तक जो चले हैं,

एक मंज़िल उनकी, एक कारवाँ होना है,

कुछ ढलना है, कुछ ढालना है साँचों में,

मन के धागों में रिश्तों को पिरोना है,

 

बरसों से अलग फ़लसफ़ों में पले हैं,

जीने के अपने दो अलग ढंग हैं,

कहीं धूप खिलेगी, कहीं तूफ़ाँ बरसेंगे,

अब उन्ही में से उगाना सतरंग हैं,

 

यह दुनिया बड़ा बोलती है इस सफ़र पर,

कभी मज़ाक़ उड़ाती है, कभी डराती है,

चलना तो पड़ेगा ही, सखी मेरी, संग हमें,

देखना है कि कितना चुप रखती है, कितनी बातें कराती है…

 


Your thoughts, your criticism, your feedback – all are very welcome. They help me know if what I’ve written resonates with you. Please consider leaving a comment below and telling me how this piece made you feel.

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2 Comments Add yours

  1. Bravo Abhimanyu!!

    Keep posting…

    Like

    1. abhiqrtz says:

      Thanks, Ganesh. Happy you liked it.

      Like

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