दीपक हो

Today is Diwali, the biggest festival of Hindu culture. I’d written previously about it here, but like most muses, it is something I can keep coming back to.

But it isn’t the festival that is the muse. Instead, all the things it symbolises: righteousness, its conquest of evil, and the inevitability of this victory – these make Diwali my favourite festival. It is an infinite fount of everything that keeps us human.

So, without further ado, I present to you this poem. And, of course, wish you a very happy (and hopeful) Diwali.

दिवाली के लिए

बड़े बरसों बाद आज घर को छुआ मैंने,

कोनों से जाले उतारे, मेज़ों-अलमारियों को साफ़ किया,

पर्दों पर, चादरों पर कई सिलवटें थीं गुस्साई सीं,

उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें माफ़ किया,

 

पुराना भी बहुत कुछ निकाल दिया आज,

कुछ कपड़े, कई काग़ज़, और बीती हज़ार यादें,

वो नोट्स जो बरसों से अधूरे पड़े थे,

उन पर छपे सपने, उनमें दर्ज़ फ़रियादें,

 

बाज़ार से कुछ रंग ख़रीदे और,

बरामदे में उन्हें रूप देने का प्रयास किया,

पता नहीं क्या बना और बना भी कैसा,

पर जीवन ने रंगत का कुछ आभास किया,

 

हाँ अमावस की रात तब पूरण हुई,

जब ज्योत जगाई एक, जब दीप जगाया,

सूर्य के तेज से रोशन हुआ सब,

चंद्र की चंचलता से घर सजाया,

 

सृष्टि भर के अंधकार पर,

अग्नि का वो प्रहरी भारी था,

उम्मीद की लौ थी, पुरुषार्थ का ईंधन,

स्वयं ही स्वयं का हितकारी था,

 

पवन में प्राण भी, पवन से संघर्ष भी,

दोनों को स्वीकार करता रहा वो सम हो,

मन मुसकाया, त्यौहार घर आया, यह सोच कर,

तुम भी क्या दीपक से कम हो…

 


Your thoughts, your criticism, your feedback – all are very welcome. They help me know if what I’ve written resonates with you. Please consider leaving a comment below and telling me how this piece made you feel.

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