ठहराव

This blog completes another year, life takes another year, and we keep running in our quest to score some bauble or the other. This year, these past months, those who know me know that I’ve been running more than most. Thankfully, tomorrow, that project ends: and you will all see the results on one of…

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दीपक हो

Today is Diwali, the biggest festival of Hindu culture. I’d written previously about it here, but like most muses, it is something I can keep coming back to. But it isn’t the festival that is the muse. Instead, all the things it symbolises: righteousness, its conquest of evil, and the inevitability of this victory –…

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केशव को

Today’s Janmashtami, the festival celebrating the birth of the 9th avatar of Vishnu. Of the 10 avatars that He took, Krishna is the only one considered ‘Poorna Avatar’ – the complete incarnation of God, Vishnu in His entirety. Krishna is complete, is absolute. He enunciated the knowledge of the Srimadbhagvat Gita, he is the Yogeshwar…

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जाने कैसी मुलाक़ात होगी

Marriage is the final triumph of societal life. All actions in public life stem from it, reach for it, and once the task is done, are set in motion again for the next generation. Nature has, of course, wired every species to seek survival. Man, thankfully, is the only one that makes such a show…

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आज छोड़ चलते हैं…

2015 is coming to an end, and with that a phase of life draws to a close. In wishing you all a very happy 2016, and indeed, the rest of your life, I also wish goodbye to the days that have passed… This poem is a celebration of the era that draws to a close…

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कोशिश

Was pondering upon what I would want from the year 2015, and I formed my thoughts in these verses. Hope you read it, and like it!  

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मुलाक़ात

कुछ दिनों पहले एक ख़याल आया था जो कविता में बुन सकता था। यूं तो यह ख़याल अक़्सर धुंआ हो जाते हैं, यह रह गया कहीं। फिर अगले ही दिन कुछ बेवजह, या शायद यूं ही मंज़ूर हो उसे जिसकी मर्ज़ी चलती है, मैं एक पसंदीदा कविता से आन मिला। लॉर्ड अल्फ्रेड टेन्नीसन ने लिखी…

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दोबारा

रिश्तों की उम्र कौन माप पाया है? कुछ सदियों ज़िंदा रहते हैं, हमें शेरों-कहानियों में मिलते हैं। कुछ पूरी ज़िन्दगी अपने पैरों पर खड़े होने में लगा देते हैं, कुछ पूरी ज़िन्दगी हर दिन जीते हैं। हर एक की अपनी उम्र होती है। हाँ, कहानियां सबकी एक ही लगती है मुझे। काफ़ी रिश्तों को क़रीब…

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सावन

बारिशों के दिन हैं, बारिश चाहे कमज़ोर ही सही। गर्मियों की झुलस के बाद जो पहली बूँद गिरती है, यूँ लगता है जैसे दम घुटने से साँस भर पहले ज़िन्दगी फिर से बहने लगी हो। सूखी, प्यासी-सी धरती और प्यासे-से अरमानों को एक राह मिलती है। जो कहीं रुकने लगी थीं, थमने लगी थीं, वो…

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​वोह आँखें क्या कहती हैं

नारी का सम्मान कहाँ और स्तर कहाँ… बम्बई की ट्रेन्स में सफ़र करता हूँ रोज़, और फर्स्ट क्लास के डब्बे लेडीज और जनरल में बंटे हैं। मेरी नज़र अक्सर फेंस के उस पर खड़ी औरतों, लड़कियों पर पड़ जाती है। उन चेहरों में, उन आखों में, उनमें अनेक सवाल, कई किस्से दिखते हैं। बस उन्हें…

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बातें

कल किसी से बात चल रही थी। उनकी एक बात से कुछ ख्याल आया, खूबसूरत था। उस ख्याल को उनसे बातों बातों में यूँ पिरोया। गर अच्छा लगे तो कहिएगा…

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