दीपक हो

Today is Diwali, the biggest festival of Hindu culture. I’d written previously about it here, but like most muses, it is something I can keep coming back to.

But it isn’t the festival that is the muse. Instead, all the things it symbolises: righteousness, its conquest of evil, and the inevitability of this victory – these make Diwali my favourite festival. It is an infinite fount of everything that keeps us human.

So, without further ado, I present to you this poem. And, of course, wish you a very happy (and hopeful) Diwali.

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केशव को

Today’s Janmashtami, the festival celebrating the birth of the 9th avatar of Vishnu. Of the 10 avatars that He took, Krishna is the only one considered ‘Poorna Avatar’ – the complete incarnation of God, Vishnu in His entirety.

Krishna is complete, is absolute. He enunciated the knowledge of the Srimadbhagvat Gita, he is the Yogeshwar – Lord of Yoga, the practical application of Indian spirituality, not just a form of exercise.

However, this is all enough and all nothing. For I firmly believe that Krishna is beyond words and thoughts, beyond experience and feeling. Surdas, the legendary Indian bhakta and poet who wrote about Krishna all his life, in fact claimed that all attempts to write about Him were futile. It is a beautiful irony, but again, highlights Surdas’ love for his Maker, and his Maker’s divinity. Here, sample it in the glorious voice of the late Jagjit Singh: https://www.youtube.com/watch?v=73ARusu3O6Y.

While I’m none to argue with the wisdom of Surdas, I have humbly attempted to write about Krishna…

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जाने कैसी मुलाक़ात होगी

Marriage is the final triumph of societal life. All actions in public life stem from it, reach for it, and once the task is done, are set in motion again for the next generation. Nature has, of course, wired every species to seek survival. Man, thankfully, is the only one that makes such a show of it.

But since the show is there, it gives rise to many stories and many rituals. Cultures change them with great frequency, art celebrates it in all. In India, we have the arranged marriage – where parents get a couple together, having previously satisfied themselves of the financial, societal, and emotional state of the other family. The young (would be) couple meets in a public place with a great delegation of their relatives, and is usually given a little amount of time to talk to each other and get to know the person. At least a couple such meetings happen, usually more.

It is a process subject to great ridicule but has also considerable success. Anyone reading this in the West will probably be shocked by this way of going about the business of marriage, but they will of course appreciate that things change in other parts of the world.

But even when some things change, some remain the same.

 

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चलो कहीं डेरा डाल लेते हैं

This year has begun with great promise: one made by me, some made by life. After all the running around and hassles of the years gone by, there looks to be signs of peace.

There is hope that we can settle down (in more ways than one), let go of the trifles of everyday living, and rest.

 

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आज छोड़ चलते हैं…

2015 is coming to an end, and with that a phase of life draws to a close. In wishing you all a very happy 2016, and indeed, the rest of your life, I also wish goodbye to the days that have passed… This poem is a celebration of the era that draws to a close today – childhood, with all its vicissitudes and victories, with all its charms and challenges, with all its memories.

I hope you had a great 2015. I wish you all the love, hope, strength, and fulfilment in 2016!

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मुलाक़ात

कुछ दिनों पहले एक ख़याल आया था जो कविता में बुन सकता था। यूं तो यह ख़याल अक़्सर धुंआ हो जाते हैं, यह रह गया कहीं।

फिर अगले ही दिन कुछ बेवजह, या शायद यूं ही मंज़ूर हो उसे जिसकी मर्ज़ी चलती है, मैं एक पसंदीदा कविता से आन मिला। लॉर्ड अल्फ्रेड टेन्नीसन ने लिखी थी, और मैंने हमेशा माना है की उसकी आखरी पंक्ति जीवन का आधार भी है और उद्देश्य भी।

जो मेरे ज़हन में था और जो टेन्नीसन के ज़हन में रहा होगा, दोनों ख़याल कहीं जाकर मिलते से लगे। जो लगा सो यह कविता लिखनी शुरू की। आशा है की यहां आपको भी मिलते नज़र आएंगे…

और हाँ, अगर आप उस कविता को पहचान गए हैं (और गर साहित्य और कविता में ज़रा रूचि है तो न पहचानने की कोई वजह भी नहीं), तो कमेंट्स में बताइयेगा!

 

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दोबारा

रिश्तों की उम्र कौन माप पाया है?

कुछ सदियों ज़िंदा रहते हैं, हमें शेरों-कहानियों में मिलते हैं। कुछ पूरी ज़िन्दगी अपने पैरों पर खड़े होने में लगा देते हैं, कुछ पूरी ज़िन्दगी हर दिन जीते हैं। हर एक की अपनी उम्र होती है। हाँ, कहानियां सबकी एक ही लगती है मुझे।

काफ़ी रिश्तों को क़रीब से देखा है मैंने। पाया है की जहां ख़ुशी है, रंग हैं, वह सब लोगों के अपने हैं।  पर जहां कलह है, दुःख, रुस्वाई है, उन सबकी एक सी पहचान होती है। ऐसा लगता है की मानों एक को देख लिया हो, तो सबको देख लिया। हम उन्ही मसौदों पर रूठते हैं, वैसे ही बेगैरद लहज़े से बात करतें हैं, उसी दर्द से बिछड़ते हैं, वही आंसू रोते हैं… सब वही है, हमने कुछ नहीं सीखा है। इन्ही उलझनों से गुज़रने का नाम हमने ज़िन्दगी कर दिया है। यही चेहरे, यही मोड़, यही सब चलता रहता है, एक के बाद एक, दोबारा…

इन्ही किस्सों, कहानियों, दोस्तों, और लोगों के ग़म को देखा है मैंने, और उसे संजो के ये कविता लिखी है। उमीद है कुछ पसंद आएगी।

 

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सावन

बारिशों के दिन हैं, बारिश चाहे कमज़ोर ही सही।

गर्मियों की झुलस के बाद जो पहली बूँद गिरती है, यूँ लगता है जैसे दम घुटने से साँस भर पहले ज़िन्दगी फिर से बहने लगी हो। सूखी, प्यासी-सी धरती और प्यासे-से अरमानों को एक राह मिलती है। जो कहीं रुकने लगी थीं, थमने लगी थीं, वो दुआएँ पेड़ों की टहनियों पर पत्ते बन खिलती दिखती हैं। हाँ, सिर्फ भला होता है ऐसा भी नहीं है। हमारे शहरों की जर्जर व्यवस्थाओं को बारिशों में डूबते देखते हैं, सड़कों पे बनती नदियों में गलते कागज़ों के कारवां हर साल न जाने कौन सा समंदर तलाशते हैं।

जीवन की बाकी तस्वीरों की तरह, सावन के भी दो चेहरे हैं: यह सृजन भी है, यह विनाश भी है। आगे लफ़्ज़ों में लेकिन कुछ एक ही सूरत दिखेगी – आशा की – और इसकी वजह भी है। आस-पास की गर्त, की दुर्व्यवस्था न गिनने से कम होगी न व्याख्या करने से। हाँ, शायद खूबसूरती और प्रयास को सोचकर हम मन के अनगिनत तनावों को भुला सकेंगे, आने वाले सवालों को टटोलने की थोड़ी ज़्यादा हिम्मत जुड़ा सकेंगे।

कई कविताएं लिखी हैं पर काफ़ी वक्त से इतना वक्त किसी ने नहीं लिया। पढ़ के बताइयेगा ज़रूर कैसी लगी…

 

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​वोह आँखें क्या कहती हैं

नारी का सम्मान कहाँ और स्तर कहाँ…

बम्बई की ट्रेन्स में सफ़र करता हूँ रोज़, और फर्स्ट क्लास के डब्बे लेडीज और जनरल में बंटे हैं। मेरी नज़र अक्सर फेंस के उस पर खड़ी औरतों, लड़कियों पर पड़ जाती है। उन चेहरों में, उन आखों में, उनमें अनेक सवाल, कई किस्से दिखते हैं।

बस उन्हें एक रूप देकर यहाँ लिखा है।

कैसी लगी बताइयेगा…

 

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