दीपक हो

Today is Diwali, the biggest festival of Hindu culture. I’d written previously about it here, but like most muses, it is something I can keep coming back to.

But it isn’t the festival that is the muse. Instead, all the things it symbolises: righteousness, its conquest of evil, and the inevitability of this victory – these make Diwali my favourite festival. It is an infinite fount of everything that keeps us human.

So, without further ado, I present to you this poem. And, of course, wish you a very happy (and hopeful) Diwali.

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चलो कहीं डेरा डाल लेते हैं

This year has begun with great promise: one made by me, some made by life. After all the running around and hassles of the years gone by, there looks to be signs of peace.

There is hope that we can settle down (in more ways than one), let go of the trifles of everyday living, and rest.

 

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आज छोड़ चलते हैं…

2015 is coming to an end, and with that a phase of life draws to a close. In wishing you all a very happy 2016, and indeed, the rest of your life, I also wish goodbye to the days that have passed… This poem is a celebration of the era that draws to a close today – childhood, with all its vicissitudes and victories, with all its charms and challenges, with all its memories.

I hope you had a great 2015. I wish you all the love, hope, strength, and fulfilment in 2016!

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Winter in the City

Here’s something I had written earlier, forgotten about completely, and rediscovered recently. Since summer is still marauding us these days, I think publishing a poem about winter still makes sense.

After all, aren’t we all in a perpetual yearning for the beautiful days of the past or the beautiful days of tomorrow? Aren’t we all just looking for an escape even when we know there isn’t one?

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All Vacations Must End

At times, your words don’t come from you. They are too powerful to belong to one voice, their meaning too deep for one tale. Recently, I uttered some of this sort. They were said to someone I know in a jovial tone, without much thought gone in their formation.

And yet, when I reflected on them, I was saddened. Extremely. By their weight, the lost possibilities they spoke of, the grief of demise they had. Moved, I wrote this poem, and made those words its title. Let me know how you like it.

 

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मुलाक़ात

कुछ दिनों पहले एक ख़याल आया था जो कविता में बुन सकता था। यूं तो यह ख़याल अक़्सर धुंआ हो जाते हैं, यह रह गया कहीं।

फिर अगले ही दिन कुछ बेवजह, या शायद यूं ही मंज़ूर हो उसे जिसकी मर्ज़ी चलती है, मैं एक पसंदीदा कविता से आन मिला। लॉर्ड अल्फ्रेड टेन्नीसन ने लिखी थी, और मैंने हमेशा माना है की उसकी आखरी पंक्ति जीवन का आधार भी है और उद्देश्य भी।

जो मेरे ज़हन में था और जो टेन्नीसन के ज़हन में रहा होगा, दोनों ख़याल कहीं जाकर मिलते से लगे। जो लगा सो यह कविता लिखनी शुरू की। आशा है की यहां आपको भी मिलते नज़र आएंगे…

और हाँ, अगर आप उस कविता को पहचान गए हैं (और गर साहित्य और कविता में ज़रा रूचि है तो न पहचानने की कोई वजह भी नहीं), तो कमेंट्स में बताइयेगा!

 

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दोबारा

रिश्तों की उम्र कौन माप पाया है?

कुछ सदियों ज़िंदा रहते हैं, हमें शेरों-कहानियों में मिलते हैं। कुछ पूरी ज़िन्दगी अपने पैरों पर खड़े होने में लगा देते हैं, कुछ पूरी ज़िन्दगी हर दिन जीते हैं। हर एक की अपनी उम्र होती है। हाँ, कहानियां सबकी एक ही लगती है मुझे।

काफ़ी रिश्तों को क़रीब से देखा है मैंने। पाया है की जहां ख़ुशी है, रंग हैं, वह सब लोगों के अपने हैं।  पर जहां कलह है, दुःख, रुस्वाई है, उन सबकी एक सी पहचान होती है। ऐसा लगता है की मानों एक को देख लिया हो, तो सबको देख लिया। हम उन्ही मसौदों पर रूठते हैं, वैसे ही बेगैरद लहज़े से बात करतें हैं, उसी दर्द से बिछड़ते हैं, वही आंसू रोते हैं… सब वही है, हमने कुछ नहीं सीखा है। इन्ही उलझनों से गुज़रने का नाम हमने ज़िन्दगी कर दिया है। यही चेहरे, यही मोड़, यही सब चलता रहता है, एक के बाद एक, दोबारा…

इन्ही किस्सों, कहानियों, दोस्तों, और लोगों के ग़म को देखा है मैंने, और उसे संजो के ये कविता लिखी है। उमीद है कुछ पसंद आएगी।

 

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Reading Gulzar – Aanewaala Pal

Gulzar (Click on the image for source.)

Gulzar (Click on the image for source.)

Today, August 18, He celebrates His birthday.

Some 80 years ago, the Maker gave Hindi literature and cinema a gift like no other – Sampooran Singh Kalra was born in Deena, Punjab, now in Pakistan.

He brought the love of words to our cinema, has celebrated the greatness of love in everyday objects and deeds, and then mocked its fickle nature too with more than a snide, pithy remarks. The moon, the rain, the birthmark on the shoulder of a loved one – nothing was not sacred, nothing not revered. We may not have the poetry, the music, or even the singing of yesteryear, as popular wisdom will have you believe, but this man, this icon, this institution still writes. Still gives us dreams!

Whereas there’s no dearth of His writing, I selected this evergreen song to commemorate today. After all, the ephemeral nature of Life, its momentary beauty, and toying with its myriad mirages – I believe this is what He probably finds most joy in!

Film: Golmaal

Music: R. D. Burman

Singer: Kishore Kumar

Lyrics: 🙂

Here goes…

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सावन

बारिशों के दिन हैं, बारिश चाहे कमज़ोर ही सही।

गर्मियों की झुलस के बाद जो पहली बूँद गिरती है, यूँ लगता है जैसे दम घुटने से साँस भर पहले ज़िन्दगी फिर से बहने लगी हो। सूखी, प्यासी-सी धरती और प्यासे-से अरमानों को एक राह मिलती है। जो कहीं रुकने लगी थीं, थमने लगी थीं, वो दुआएँ पेड़ों की टहनियों पर पत्ते बन खिलती दिखती हैं। हाँ, सिर्फ भला होता है ऐसा भी नहीं है। हमारे शहरों की जर्जर व्यवस्थाओं को बारिशों में डूबते देखते हैं, सड़कों पे बनती नदियों में गलते कागज़ों के कारवां हर साल न जाने कौन सा समंदर तलाशते हैं।

जीवन की बाकी तस्वीरों की तरह, सावन के भी दो चेहरे हैं: यह सृजन भी है, यह विनाश भी है। आगे लफ़्ज़ों में लेकिन कुछ एक ही सूरत दिखेगी – आशा की – और इसकी वजह भी है। आस-पास की गर्त, की दुर्व्यवस्था न गिनने से कम होगी न व्याख्या करने से। हाँ, शायद खूबसूरती और प्रयास को सोचकर हम मन के अनगिनत तनावों को भुला सकेंगे, आने वाले सवालों को टटोलने की थोड़ी ज़्यादा हिम्मत जुड़ा सकेंगे।

कई कविताएं लिखी हैं पर काफ़ी वक्त से इतना वक्त किसी ने नहीं लिया। पढ़ के बताइयेगा ज़रूर कैसी लगी…

 

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